ब्यष्टि (Byashti)-(Single one)
एक प्रकार की बस्तु बा पदार्थ किम्बा एक जीव को ब्यष्टि कहते हैं। जैसे एक बृक्ष।
समष्टि (Samashti)-(All total)
एक प्रकार की सारे बस्तु बा पदार्थ किम्बा सारे जीवों के समूह को समष्टि कहते हैं किम्बा एक ईश्वर कहते है। जैसे सारे बृक्ष के समूह को जंगल बा बृक्षों की समष्टि।
जड़ (Jada)-(Inert)
वह अनात्म बस्तु बा पदार्थ जिसे अपना को बोध हो और अन्य का बोध न हो, उसको जड़ कहाजाता है। जैसे शरीर, घडी, सारे element इत्यादि।
चेतन (Chetan)-(Consiusness)
वह आत्म बस्तु बा पदार्थ जिसे अपना को बोध हो और अन्य का बोध हो, उसको चेतन कहाजाता है। जैसे प्राणी, पशु, पक्षी इत्यादि।
ब्यष्टि चेतन (Byashti chetan)-(Single one consiusness)
एक जीव के अंदर ब्याप्त चेतना को ब्यष्टि चेतन कहते हैं। ex- जैसे एक मनुष्य की चेतन को ब्यष्टि चेतन ।
समष्टि चेतन (Samashti chetan)-(All total consiusness)
सारे जीवों समूह के अंदर ब्याप्त चेतना को समष्टि चेतन कहते हैं। ex- जैसे सारे मनुष्य की चेतन को की समष्टि चेतन ।
सामान्य चैतन्य (Samanya chaitanya)-(Normal & inactive chaitanya)
जो अस्ति, भाति, प्रिय, रूप से सदा सर्बत्र बिद्यमान रहता है। जिसमें किसी प्रकार की क्रिया बिशेष प्राणियों की तरह नहीं होती। उसको सामान्य चैतन्य कहाजाता है। वही सामान्य चैतन्य आत्मा में हूँ।
बिशेष चैतन्य (Bishesh chaitanya)-(Pointed, noun & active chaitanya)
अन्तःकरण में सामान्य चैतन्य स्वरूप की प्रतिबिम्ब रूप चिदाभास के कारण जिसमें सारे प्रकार की क्रिया बिशेष प्राणियों की तरह होती है, उसे बिशेष चैतन्य कहाजाता है। जिसमें चिदाभास बिज्ञान के अभाब की कारण मनुष्य जीब ब्रम्ह में अपना परमात्मा तत्व से बिमुख हो कर समस्त क्रियाओं का कर्ता एबं फल भोक्ता बन चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण करता हुआ दुःख पाता रहता है।
परिणाम (Parinam)-(Result)
जो कारण अपने कार्य रूप में बिकार हो जाता है उसे परिणाम कहते हैं। जैसे दूध दही रूप लेना। दही दूध का परिणाम उपादान कहलाता है। दही पुनः दूध, चावल पुनः धान, आटा पुनः गेहूं नहीं बन सकेगा। इस प्रकार आत्मा परमात्मा का बिकार या परिणाम नहीं है बल्की विवर्तन है।
बिबर्तन (Bibartan)-(diffraction)
जो कारण अपने कार्य रूप में बिना बिकार लाये प्रतीत होता है उसे विवर्तन कहते हैं। जैसे स्वर्ण अलंकार रूप लेना। अलंकार स्वर्ण का विवर्तन उपादान कहलाता है। अलंकार पुनः स्वर्ण, वर्तन पुनः लोहा बन सकेगा। इस प्रकार आत्मा परमात्मा का विवर्तन रूप है।
बिषय (Bishaya)-(Subject)
आत्मा और परमात्मा की, परमात्मा और ब्रम्ह की, ब्रम्ह और परमब्रम्ह की एकता को बेदान्त शास्त्र में बिषय कहते है।
अक्रिय (Akriya)-(Deactive)
जिसमे कौणसी प्रकार क्रिया होने की संभाबना दिखाई न पड़े, उसे अक्रिय कहते हैं।
सक्रिय (Sakriya)-(Active)
जिसमे कौणसी प्रकार क्रिया होता हुआ दिखाई पड़े, उसे सक्रिय कहते हैं।
निष्क्रिय (Nishkriy)-(Inactive)
जिसमे कौणसी प्रकार क्रिया नहीं होता हुआ दिखाई पड़े बा क्रियाहीन दिखाई पड़े, उसे निष्क्रिय कहते हैं।
अखण्ड (Akhanda)-()
जो कहीं भी खंडित नहीं हो किंवा देश परिच्छेद, काल परिच्छेद, बस्तु परिच्छेद से रहित पदार्थ को अखण्ड कहते है। अथबा अपरिच्छिन कहते हैं।
देश परिच्छेद (Desh Parichheda)-()
जो पदार्थ एक देश में हो और दूसरे देश में न हो वह देश परिच्छेद कहलाती है।
काल परिच्छेद (Kaal Parichheda)-()
जो पदार्थ एक काल में हो और दूसरे काल में न हो वह काल परिच्छेद कहलाती है।
वस्तु परिच्छेद (Kaal Parichheda)-()
जो पदार्थ एक वस्तु में हो और दूसरे वस्तु में न हो वह वस्तु परिच्छेद कहलाती है।
अपरिच्छिन (Aparichhina)-()
जो पदार्थ सारे देश, सारे काल एबं सारे बस्तु रूप हो उसे अपरिच्छिन कहते हैं।
परिच्छिन (Parichhina)-()
जो पदार्थ एक देश, एक काल एबं एक बस्तु रूप हो उसे परिच्छिन कहते हैं।
असंग (Asanga)-()
जिस सत्ता का किसी के साथ सजातीय सम्बंध न हो, किसी के साथ विजातीय सम्बंध न हो एबं जिसका स्वगत भेद न हो उसे असंग कहते हैं। जैसे में, आत्मा।
सजातीय (Sajatiya)-()
अपने समान जाति वाले को सजातीय कहते है। जैसे मनुष्य - मनुष्य, पशु - पशु ।
विजातीय (Bijatiya)-()
अपने से अन्य जाति वाले को विजातीय कहते हैं। जैसे मनुष्य - पशु, मनुष्य - पक्षि।
स्वगत (swagat)-()
अपने अंतर्गत रहने वाले भेद को स्वगत भेद कहते हैं। जैसे हाथ, पैर, मुख, नाक, कान इत्यादि।
पंचकोश = अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनंदमय कोश।
अन्तःकरण चतुष्टय = मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार।
अन्तःकरण पंचष्टय = बिबेक, बुद्धि, मन, चित्त, अहंकार।
पंच ज्ञानेन्द्रिय = श्रोत्र, चक्षु, त्वाचा, जिह्वा, घ्राण।
पंच कर्मेन्द्रिय = बाक, पाद, पानी, लिंग, गुदा।
पंच भूत = आकाश, तेज, बायु, जल, पृथ्वी।
पंच प्राण = ब्यान, उदान, समान, प्राण, आपना।
पंच उपप्राण = नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय।
पंच प्राणबायु = ब्यान बायु, उदान बायु, समान बायु, प्राण बायु, आपना बायु।
पंच उप-प्राणबायु = नाग बायु, कूर्म बायु, कृकल बायु, देवदत्त बायु, धनंजय बायु।
पंच बिषय = सब्दा, रूप, स्पर्श, रस, गंध।
त्रिनाथ (DNA System) = लोकनाथ, जगतनाथ, विश्वनाथ।
त्रिपूति = अध्यात्म, अधिदेव, अधिभूत।
त्रिताप = अधिदेबिक, अधिभूतिक, अध्यात्मिक।
त्रिगुण (Gene System) = सत्त्व, रज, तम।
त्रिदोष = मल, विक्षेप, आवरण ।
त्रिकाण्ड = कर्म (Deed), उपासना(Worship), ज्ञान (Knowledge) ।
साधन चतुष्टय = बिबेक, बैराग्य, सट संपति (शम, दम, तितिक्ष्या, श्रद्धा, उपरामता, समाधानता), मुमुक्ष्युता ।
वेद मंत्र = ज्ञान (4,000), उपसना (16,000), कर्म (80,000) ।
त्रिकर्म (Trikarma)-(3 deeds) = संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण
84, 00,000 (84 Lakshya) Zone & Joni
मानब (देवता, दैत्य, दानबा, मनुष्य) = Human beings = 4, 00,000
पशु (स्थलज) = Animals = 30, 00,000
पक्षी = Birds = 10, 00, 000
जलज = Aquatic Live/water life = 9, 00, 000
सरीसृप, क्रुमी = Reptiles, Worms = 11, 00, 000
स्थाबर = बनस्पतिक-Botanicals (Trees, plants, woods, stems, leafs, flower, fruit) = 20, 00 000
Insect (कीट-पतंग) is the extra creature extension of 84, 00,000 Zone = कीट-पतंग 84, 00,000 ज़ोन का अतिरिक्त जीव विस्तार है।
Weevil (कीडा) is the extra creature extension of 84, 00,000 Zone = कीडा 84, 00,000 ज़ोन का अतिरिक्त जीव विस्तार है।
आनंद की वृत्ति
1.प्रिय, 2.मोद, 3.प्रमोद
प्रिय वृत्ति
इच्छित पदार्थ को दूर से दर्शन होने से मन में जो सुखानुभूति होती है, वह आनंद की प्रिय बृत्ति कहलाती है। जैसे बृक्ष पर फल और पुष्प देखना, दुकान पर इच्छित पदार्थ दिखाई पड़ना। दूरसे मन्दिर देखलेना।
मोद वृत्ति
इच्छित पदार्थ को प्राप्त कर लेने से जो सुखानुभूति होती है, वह आनंद की मोद बृत्ति कहलाती है। जैसे बृक्ष पर फल और पुष्प प्राप्त कर लिया, दुकान पर इच्छित पदार्थ को प्राप्त कर लेना।
प्रमोद वृत्ति
इच्छित पदार्थ को भोग लेने से जो सुखानुभूति होती है, वह आनंद की प्रमोद बृत्ति कहलाती है। जैसे बृक्ष पर फल और पुष्प प्राप्त कर भोजन कर लिया, दुकान पर इच्छित पदार्थ को प्राप्त कर के उपयोग कर लेया ।
बुद्धि ज्ञान की सप्त भूमिका
1.शुभेच्छा, 2.सुविचारणा, 3.तनुमानसी, 4.सत्वापत्ति, 5.असंसक्ति, 6.पदार्थाभाबनि, 7.तुर्ज्यागा ।
शुभेच्छा : आत्मा के जानने की शुभ इच्छा
सुविचारणा : नित्यानित्य बिबेक
तनुमानसी : मन से स्थूलता का नाश एबं सूक्ष्मता की जाग्रति
सत्वापत्ति : आत्म निष्ठा की प्राप्ति (आत्मसाक्ष्यात्कार)
असंसक्ति :आसक्ति का सर्बथा अभाब
पदार्थाभाबनि : नाम, रूप, जगत का पूर्ण अभाब निश्चय कर सबको उनके अधिष्ठान कारण रूप देखना। जैसे घड़े को मिटी रूप देखना।
तुर्ज्यागा : बाह्य जगत का किंचित भी होश न रहना तथा खान, पान, स्नानादिक देहा की क्रियाओं का होश न होना। जैसे नमक सागर में बिलीन हो पूनः बाहर नहीं अती इस प्रकार वह ब्रम्ह स्वरुप में स्थिती प्राप्त कर चूका है।
बुद्धि अवस्था के भेद
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा, ध्यान, समाधि ।
शरीर के भेद
स्थूल, सूक्ष्म, कारण ।
स्नान के भेद
शारीरिक, मानसिक, आत्मिक।
वासना
शास्त्र वासना, लोक वासना, देह वासना।
षड शास्त्र
1.वैशेषिक, 2.न्याय, 3.सांख्य, 4.योग, 5.कर्म (पूर्व मीमांसा), 6. ज्ञान (धर्म या उत्तर मीमांसा, वेदान्त दर्शन) ।
षड आचार्य एबं दर्शन
कणाद = वैशेषिक, गोतम = न्याय, कपिल = सांख्य, पतंजलि = योग, जैमिनी = कर्म (पूर्व मीमांसा), वेद ब्यास = ज्ञान (धर्म याउत्तर मीमांसा, वेदान्त दर्शन)
