वह जो परमब्रम्ह श्रीचैतन्य दिखाई नहीं पड़ते हैं। वह अनादि अनंत है और अपने आप में पूर्ण है एबं सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। कियुंकी पूर्ण से पूर्ण की उत्पति (उदय ) होता है। यह दृश्यमान जगत भी अनंत है और अपने आप में संपूर्ण है, यह जगत भी उस परम्ब्रम्ह श्रीचैतन्य से पूर्ण ही है। उस प्रकार पूर्ण अनंत परम्ब्रम्ह श्रीचैतन्य से अनंत पूर्ण बिश्व ब्रम्हांड उत्पति हो कर बहिर्गत (निकला ) हुआ है। अर्थात पूर्ण से पूर्ण बहिर्गत (निकला ) होने पर भी वह पूर्ण परम्ब्रम्ह श्रीचैतन्य ही रहे जाते हैं। वह अनादि अनंत पूर्ण परम्ब्रम्ह श्रीचैतन्य ही संपूर्ण पूर्ण संसार बिश्व ब्रम्हांड उत्पति/बना सकते हैं।
जो अपूर्ण हे अर्थात पूर्ण नहीं हे। वह अपूर्ण होने के कारण पूर्ण संसार बना नहीं सकते। *ॐ शांति *
परमात्मा(Paramatmaa)-(Supreme Soul)
परमात्मा नित्य चैतन्य जी के एक बृहतम स्वरूप सत्ता है, जो क्षुद्रतम सत्ता आत्माओं का समस्टी रूप है और बिराट, हिरण्यगर्भ, अब्याकृत पंचकोश से आच्छादित/घेरे/उपाधि-स्त रहते हैं । बेद, बेदान्त बिज्ञान और कार्ज्यनता, ईश्वरता, देबता, गबता, शबता, जीवता का साथ रहते हैं। चैतन्य जी के सत्ता होने के कारण ब्रम्ह जी के पूर्ण स्वभाब रहेता है। स्वयं संचालक, परिचालक, संजालक, स्वचालित, पृथक रूप कहे सकते हैं। जो स्वयं ज्ञान स्वरूप है। समस्त नाम रूप, प्रपंच, शरीर को जानता/जानते है, किन्तु जिसे मन, बुद्धि, इन्द्रियां, प्राण एबं शरीरादि कोई भी दृश्यवत जान नहीं सकते। उसे चैतन्य परमात्मा कहते हैं।
आत्मा(Atmaa)-(Soul)
आत्मा नित्य चैतन्य जी के एक क्षुद्रतम स्वरूप सत्ता है, जो पंचकोश से आच्छादित/घेरे/उपाधि-स्त रहते हैं। बेदान्त ज्ञान और जीवता का साथ रहते हैं, चैतन्य जी के सत्ता होने के कारण परमात्मा जी के पूर्ण स्वभाब रहेता है। स्वयं संचालक, परिचालक, संजालक, स्वचालित, पृथक रूप भी कहे सकते हैं। जो स्वयं ज्ञान स्वरूप है। समस्त नाम रूप, प्रपंच, शरीर को जानता/जानते है, किन्तु जिसे मन, बुद्धि, इन्द्रियां, प्राण एबं शरीरादि कोई भी दृश्यवत जान नहीं सकते। उसे चैतन्य आत्मा कहते हैं।
Meeting with Saint, Spiritual Mentor, Preceptor, Pre-preceptor यदि आपको संत, आध्यात्मिक गुरु, सद्गुरु, सद्गुरु-सद्गुरु मिले किम्बा पास दिखाई पड़े तो पूछ लीजिए आध्यात्मिक बिज्ञान निश्चित आत्म ज्ञान की बिषय संबंध में, न की दूसरा अनिश्चित अनात्म बिषय संबंध में। (If you find a Saint, Spiritual Mentor, Preceptor, Pre-preceptor or see him near you then ask him about spiritual science regarding the subject of definite Self knowledge and not about any other uncertain non-Self subject.)
आध्यात्मिक (Aadhyaatmik)-(Spiritual)
स्वयं की ऊपर अध्ययन के साथ साधन करने को आध्यात्मिक (Spiritual) कहते हैं, अर्थात आत्मा की बारे में जानने के लिए आत्मा बिज्ञान अध्ययन करने के साथ/बाद में साधन करलेने को आध्यात्मिकता (Spirituality) कहते हैं।
संसार में बहुत सारे क्षेत्र (Sector) है। यथा आध्यात्मिक, शक्ति, भाव, मान्य, ममता, ऐश्वर्य, चेतना, चिदाभास, जड़, स्रस्ता, दृष्टा, साक्षी, ऊर्जा, संबेदन, आनंद, कष्ट, रुख, दरज़, अंखंड़, सत्य, नित्य, निर्गुण, निराकार, निर्विकल्प, अद्बितीय, अस्तित्व, बिसय, रूह, दैत्य, दानब, बिस्वरूप, रस्मि, शून्य, ईसान, नैरूत, कार्ज्यन, ईश्वर, देब, गब, शब, जीव, भूत, प्रेत, भविष्यत, काल, वेद, वेदान्त, बिरुद्ध-वेद, भेध, भेद, वेध, जनता, प्राणी, उद्भिद, कवक, भुताणु, जहर, पाचक, प्रकृति, बिकृति, संस्कृति, कृत्रिम, प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, स्नेह, धर्म, अधर्म, दृश्य, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, मशीन, बस्तु, अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कृषि, प्रबंधन, संगठन, कंपनी, कार्यक्षेत्र, कार्यकारिणी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, ब्यबसाय, चक्र, उपयोग, आकाश, तेज, वायु, जल, पृथ्वी, स्वयं संचालक, परिचालक, सॉफ़्टवेयर/ कोमल तत्व, हार्डवेयर/कठिन तत्व, संजालक, स्वचालित, पृथक, नियमावली, विज्ञान, सामाजिक, संरक्षण, पालन, कौशल इत्यादि है । उस सभी क्षेत्र में गुरु और सद्गुरु रहते हैं। उसमें से आध्यात्मिक क्षेत्र सबसे ऊपर रहते हैं । क्यूंकि आध्यात्मिक क्षेत्र की वजह से ही सारे बात की कार्ज्य को कारण रूप में समझ सकते हैं और कारण को अपना excel आत्मा/परमात्मा/ब्रम्ह/परमब्रम्ह/चैतन्य स्वरुप में लय हो कर मुक्ति का रास्ता पर पहुँच सकते है। स्वयं की क्षेत्र को बिना पता किए दुसरा क्षेत्र को पता करना बेकार साबित होता है।
सबिकल्प ध्यान समाधि जोग
जहां ज्ञांता, ज्ञान, ज्ञेय तीनों की पृथक ज्ञान होने पर वि अद्वितीय ब्रम्ह से अखण्ड चित्तबृत्ति लगा रहेता है, वही अंतकरण अबस्ता में एक चित्तबृत्ति से दूसरा चित्तबृत्ति की बिच की छोटा सा शांत समय को किम्बा उसी छोटा शांत संधि समयको द्रस्टा साक्षी रहेने को सबिकल्प समाधि कहा जाता है। उसी शांत संधि समयको बढ़ा कर निर्बिकल्प समाधि तक पहुँचा जा सकता हे। आँखो की पलक झपकने की बिच की छोटा सा शांत संधि समयको द्रस्टा साक्षी रहेने को भी सबिकल्प समाधि कहा जाता है।
निर्बिकल्प ध्यान समाधि जोग
जहां ज्ञांता, ज्ञान, ज्ञेय तीनों की पृथक ज्ञान रुपक त्रिपुटी भेद समाप्त हो जाता हे एबं अद्वितीय ब्रम्ह से अखण्ड चित्तबृत्ति स्तिर रहेता है, वही अंतकरण अबस्ता की शांत समय को द्रस्टा साक्षी रहेने को निर्बिकल्प समाधि कहा जाता है। जैसे लबन जल में मिल ने पर जलज्ञान रह जाता हे, उस प्रकार अज्ञान की नास हो कर चित्तबृत्ति एक ब्रम्ह में लीन हो जाता है, जिस में और कुछ दैत्य भाब अनुभब नहीं होता।
सुषुप्ति एबं निर्बिकल्प समाधि में बृत्ति-ज्ञान का अभाब समान भाब में रहेता है। भेद इतना पता चलता है की सुषुप्ति में आत्माकार चित्तबृत्ति नहीं रहता किन्तु निर्बिकल्प समाधि में आत्माकार चित्तबृत्ति का प्रकाश रहता है।
सहज ध्यान समाधि जोग
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा, ध्यान, समाधि इन समस्त प्रपंच को जो इस देह भीतर रहकर जनता है, वह सर्ब प्रकाशक, स्वयं प्रकाश, सर्बाधिष्ठान एक आत्मा है वही जीब आत्मा की वास्तबिक स्वरुप है। जो समस्त मन, बुद्धि का प्रकाशक है, वह ब्रम्ह है, वह तू है ऐसा जानना ही बिचार समाधि है। चित्त को शांत होने को समाधि कहते है। वेद वेदान्त में रह कर सही रूप में प्रकृति की बिज्ञान को समझ कर प्रत्येक परत की बिज्ञान पर चित्त की एकाग्रता ही सहज समाधि है।
आनंदघन ध्यान समाधि जोग (Pleasure Meditation Mausoleum Yoga)
ध्यान में बैठकर शरीर के बृत्तियों को शांत अबस्ता को ले आना। सारे अंग प्रत्यांग को अपना स्थिति में रख अंदर की तरफ केंद्रित करके उर्धमुखी होना और मनको महाकारण शरीर में प्रवेश करबाना और अपना आनंदघन स्वरुप के प्रति एकाग्र होना अर्थात चैतन्य स्वरुप के सन्मुख हो जाने को समाधि कहते हैं।
उसीमे महिला की रज और पुरुष की बिर्ज्य एक प्रकार की अंदरूनी प्रसंस्करण में स्वचालित स्वतः ऊपर की मार्ग तरफ गुजरते हैं। जिसमें हम आनंदघन की अनुभब करते हैं। इसलिए रज और बिर्ज्य की नास/नष्ट नहीं करना चाहिए। वह आनंद स्वरूपकी एक शारीरिक तत्व है।
लेकिन अब 10,000 वर्षों बा एक जुग के लिए स्वचालित समाधि प्रणाली बंद किया गया है ।
निर्बान (Nirban)-(Premature death & death)
ध्यान में बैठकर शरीर के बृत्तियों को शांत अबस्ता को ले आना। सारे अंग प्रत्यांग को अपना स्थिति में रख अंदर की तरफ केंद्रित करके उर्धमुखी होना और मनको महाकारण शरीर में प्रवेश करबाना और अपना शरीर की सारा प्राण तत्व को एकत्रीत करके शरीर की excel का अग्र भाग में अर्थात आज्ञां चक्र की रास्ते में सारे प्राण तत्व को शरीर (अन्नमय कोष) से निकाल लेने को निर्बान कहते हैं। उसको समयपूर्व, असामयिक मृत्यु कहते हैं । परमात्मा दिया हुए समय से पहले मृत्यु को चला जाना।
उसके बाद अपना प्राण तत्व को अपना स्तान पर रखने केलिए पूर्ण जानकारी ईश्वर से प्राप्त कर के अपना प्राण तत्व रख लेना चाहिए, उस प्रकार अपना मन, अहंकार, चित्त, बुद्धि और सारे त्रिपुटीयों को अपने अपने स्तान पर सठिक भाब से पहुँचाना अर्थात एक लोक से दूसरा लोक तक पहुंच ने केलिए कितने युग बित जाएगा जो सबसे बड़ा कठिनाई है। उस प्रकार एक के बाद एक तत्व को रख कर उपर की तरफ जात्रा करना बड़ा कठिन होता है। अपना परमात्मा से मिलने केलिए अनंत युग बीत जाएगा। सबसे अच्छा हे की भक्ति बेदान्त की बिज्ञान प्राप्त करके साधन कर भक्ति बेदान्त में अपना निर्गुण निराकार परमात्मा को या परमा पूज्य भगबान को मिले।
माया (Maya)-(Illusion)
माया एक बिज्ञान है। जो बिज्ञान वस्तु जगत से ले कर परमब्रम्ह श्रीचैतन्य जगत तक ब्याप्त हैं। हम अपना बुद्धि बिबेक से बिज्ञान को समझते हैं। जहाँ तक हमारा बुद्धि बिबेक में बिज्ञान पकड़ में आता हे, वहा तक हम उसको स्वयं की बिज्ञान कहते हैं। और जहाँ बिज्ञान हमारा बुद्धि बिबेक से परे हो जाते हे, उस ऊपर बाला बिज्ञान को हम समझ नहीं पाते, अर्थात ऊपर बाला बिज्ञान/बुद्धि बिबेक से परे बिज्ञान को हम माया/भ्रम कहते हैं। जो सब भ्रम लगता है, वह ब्रम्ह का स्वरुप है। (1 joke for laugh=जो लोक भ्रम हे, वह ब्रम्ह है।)
उस समय पर हम गुरु, सदगुरु एबं ईश्वर किम्बा माया जीको प्रार्थना करना पड़ता हे। सुद्ध 3 गुण से जथा सत्वगुण, रजगुण, तमगुण में माया निर्मित हे। जिसमें सत्वगुण मुख्य रहता हे। जो रजोगुण तथा तमोगुण को दबा कर रखता है।
उदहारण 1:- एक CNC जंत्र को चलाने बाला उसका computer software programming को जान नहीं सकता। वह उस जंत्र प्रचालक केलिए माया/बिज्ञान/भ्रम हे। वह उसको जानने केलिए गुरु और प्रशिक्षण एबं तालीम लेने की जरुरत होगी।
उदहारण 2:- उस तरह हम ईश्वर के संसार में अपना संसार बनाते हैं। तो हम को हमारे बिज्ञान की सेबा ईश्वर के माया/बिज्ञान/भ्रम के बारे में पता नहीं चलता। ऐसे पंच महाभूत के बारे में भि कुछ पता नहीं चलता की आकाश, तेज, बायु, जल, पृथिवी किया हे और उनके ब्यबहार किया हे। इसलिए हम ईश्वर को भक्ति के साथ प्राथना करना पड़ता हे। हम को माया/बिज्ञान/भ्रम बारे में ज्ञान प्रदान करे।
उदहारण 3:- हम अभी जीब रूप में होने की कारण ईश्वर बिद्या/बिज्ञान हमको माया रूप लगता हे, वह हमारा बुद्धि बिबेक से परे हो जाते हे ।
अपना माया (Personal Illusion) भी होते हैं। वह दो प्रकार की होते हैं। यथा ज्ञान माया और मुर्ख माया ।
उदहारण 1:- एक लोक इधर उधर से प्रेम सिख कर उसका calculation and account के माध्यम से सजाकर एक आध्यात्मिक सदगुरु के ऊपर अपने मन की माध्यम से प्रेम भाब अर्पित किया उसके बाद ईश्वर ने उसको 1, 00,000 billion BTC तोफा की रूप में और एक spiritual job प्रदान किए अपनी ब्रम्ह स्वरुप के निचे। उसको हम अपना ज्ञान माया (Knowledge Illusion) कहते हैं।
उदहारण 2:- ऐसे एक machine निर्माण कर देंगे उसका operating पता नहीं होग़ा। उसको हम अपना मुर्ख माया (Stupid Illusion) कहते हैं । (Stupid Illusion gives more laughs to Vidwan (Science people).)
उदहारण 3:- एक लोक सही बिज्ञान नहीं होने पर भी वह इधर उधर से सिख कर chemical bonding कर रहा था अपना calculation खराप रहे ने की कारण एक chemical की मात्रा ज्यादा ले गयाथा और experiment समय विस्फोट हो गया और उस लोक की जीबन उड़ गया, उसको हम अपना मुर्ख माया (Stupid Illusion) कहते हैं।
उदहारण 4:- थोड़ा थोड़ा पेड़ काटना सीखिने की बाद अपना गणना और हिसाब के साथ पेड़ ऊपर चला जाना और जिस साखा को काटना हे उसके ऊपर बैठ कर पेड़ को काटना। उसको हम अपना मुर्ख माया कहते हैं। उस प्रकार अपना मुर्ख माया दुसरो को पता नहीं चलता उसकी जीबन बचाने के लिए।
मूर्ख और गधा लोक सारे समय कहते हैं की ईश्वर की माया में हम लोक फस जाते हैं। कभी कभी ईश्वर बनाया हुआ संसार को भी बिना सोचे समझे नरक का द्वार किम्बा नरक भी कहे देते हैं। जिस स्वर्ग की बिज्ञान आप समझ नहीं पाओगे वह आप के लिए नर्क बन जाता हे । इसीलिए ईश्वर की कुछ भी बस्तु/स्वर्ग को बिना बिज्ञान के हात लगाना किम्बा घुसना नहीं चाइए। वह लोक ईश्वर की बिज्ञान और प्रौद्योगिकी/तकनीकी को समझ ने की काबिलयत नहीं होता। फिरभी वह लोक अपना माया बनाते हैं और खुद फस जाते हैं कभी कभी ततक्षयनात मर भी जाते हैं।
बाया (Baya)-(Delusion)
बाया एक प्रचंड आध्यात्मिक जीब बिज्ञान है। ईश्वर बिज्ञानी को माया और जीब बिज्ञानी को हम बाया कहते हैं।
द्रष्टा (Drasta)-(Watcher)
सबको देखने वाला चैतन्य परब्रम्ह को अन्तःकरण उपाधि के कारण द्रस्टा कहते हैं। जैसे समस्त दृश्यों का प्रकाशक, मैं की रूप में ।
साक्षी (Saakshi)-(Witness)
अन्तःकरण की उसी देश में घेरे हुए रहे कर सब देखने वाला चैतन्य परब्रम्ह को साक्षी कहते हैं। जैसे समस्त दृश्यों का प्रकाशक, तुम की रूप में ।
दृश्य (Drusya)-(Scene)
चैतन्य परब्रम्ह की पांच भौतिक की बिषय जगत स्वरूप, जो दिखाई पड़ता है, उसको दृश्य कहते है। किंवा मेरे द्वारा जो सब दिखाई पड़ता है उसको दृश्य कहते हैं। जैसे देह संघात एबं समस्त जगत।
बिद्या (Vidya)-(Erudition)
अपना बिज्ञान (जीव ईश्वर की एकता को जान लेना) को बाहर जगत से प्राप्त करके साधन की रूप को विद्या कहते हैं। उदाहरण:- गुर और शिस्य, सिक्ष्यक और विद्यार्थी, पूजा और पाठ से, कर्म से, प्रकृति से, संस्कृति से, पेड़ और पौधे। Science collect from external world.
अविद्या (Avidya)-(Ignorance)
जीव ईश्वर को भिन्न मान लेना और आत्मा परमात्मा अलग अलग रूप बाहर से ग्रहण करना ही अविद्या हे।
ज्ञान (Gyan)-(Knowledge)
अपना बिज्ञान (जीव ईश्वर की एकता को जान लेना) को भीतर जगत से प्राप्त करके साधन की रूप को ज्ञान कहते हैं। उदाहरण:- देवता से, ईश्वर से, परमात्मा जी से, ब्रम्ह जी से, परमब्रम्ह जी से, चैतन्य जी से । Science collect from einternal world.
अज्ञान (Agyan)-(Unwitting)
जीव ईश्वर को भिन्न मान लेना और आत्मा परमात्मा अलग अलग रूप अंदर में मानना ही अज्ञान हे।
मुर्ख (Murkha)-(Stupid)
जिसकी तीक्ष्ण विद्या और ज्ञान नहीं रहता साधारण रूप में अल्प विद्या और ज्ञान रहता हो एबं जादातरः वह अज्ञान और अबिद्या रहता हो उसको मुर्ख कहाजाता है।
मूढ़ (Mudha)-(idiot)
जो अपने धन, बल, पद, ज्ञान, रूप, कुल, जाति के घमंड में अकड़ा रहना है एबं संतो ज्ञानी से द्वेष करता है, संत ज्ञान में अश्रद्धा रखता है, संतो को देख प्रणाम नहीं करता है। उसे मूढ़ कहते हैं।
दिब्य चक्षु/ दिब्य दृस्टी
दिब्य चक्षु = ज्ञान चक्षु
ज्ञान चक्षु = बिचार नेत्र
बिचार नेत्र = लय चिंतन
लय चिंतन = कार्य को कारण रूप देखना
वेदान्त (Vedant)
वेदान्त वेद का excel स्वरूप है। वेद के अन्तिम भाग, ज्ञान काण्ड को वेदान्त कहेते हैं। सभी उपनिषद वेदान्त के अंतर्गत अति हे। अथबा जिसे जानने के बाद और जानने को कुछ भी सेष नहीं रहता है । उसमे अपना अखंड स्वरुप की दर्शन मिलता है, उस परम्ब्रम्ह श्रीचैतन्य ज्ञान को वेदान्त कहते हैं।
अनादि (Anadi)
जो बस्तु उत्पत्ति/आरंभ रहित होती है उसे अनादि कहते हैं।
अनंत (Ananta)-(Infanite)
जो बस्तु नाश/अंत रहित होती है उसे अनंत कहते हैं।
आकाश (Akash)-(Sky)
उस ब्रम्हाण्ड की शुन्य स्तर की उपर जो ईशान ब्रम्ह की आकाश तत्व ब्याप्त है, उसको आकाश कहाजाता है।
महाआकाश (Mahaakash)-(Space sky)
उस ब्रम्हाण्ड की भीतर और बहार के शुन्य स्तर की उपर जो ईशान परमब्रम्ह की आकाश तत्व ब्याप्त है, उसको महाआकाश कहाजाता है।
घटाकाश (Ghatakash)-(Pot/body Sky)
घट के अंदर आकाश को घटाकाश कहते है।
मठाकाश (Mathakash)-(Monastery Sky)
मठ के अंदर आकाश को मठाकाश कहते है।
अनंत कोटि (Ananta koti)-(Infinity crore)
अनंत को एक कोटि बार लिखने/करने पर अनंत कोटि कहाजाता है। Ex- (Infinity Infinity Infinity……………………)
अनंत पराध्य (Ananta paradhya)-(Infinity 10 trillion)
अनंत को एक पराध्य बार लिखने/करने पर अनंत पराध्य कहाजाता है। Ex- (Infinity Infinity Infinity………………….)
अनंत आराधना (Ananta Aaradhna)-(Infinity ……)
अनंत को एक आराधना बार लिखने/करने पर अनंत आराधना कहाजाता है। Ex- (Infinity Infinity Infinity………………….)
सद्गुरु-सद्गुरु (Sadguru-Sadguru)-(Pre-Preceptor)
जो भ्रांतियों एवं संशय से मुक्त करा कर अपना अस्तित्व का बिज्ञान दे कर अपना क्षेत्र (Sector) का कार्य की कारण रूप क्षेत्रज्ञं (field expert) चैतन्य स्वरूप परमब्रम्ह रूप में लय करा दे कर उस परमब्रम्ह को 'सोऽहं' बा 'अहँपरमब्रम्हास्मि' रूप में निश्चय कराकर जीव (मनुष्य) को जीवन मुक्ति का बोध करादेते हैं। वही सद्गुरु-सद्गुरु उपास्य है । ऐसे श्रोत्रिय ब्रम्हनिष्ठ उपाधि वाले को सद्गुरु-सद्गुरु कहते हैं। सद्गुरु-सद्गुरु चैतन्य परमब्रम्ह ज्ञान के अधिकारी हैं।
सद्गुरु (Sadguru)-(Preceptor)
जो भ्रांतियों एवं संशय से मुक्त करा कर अपना क्षेत्र (Sector) का कार्य की कारण रूप का बिज्ञान दे कर चैतन्य स्वरूप ब्रम्ह रूप में लय करा दे कर उस ब्रम्ह को 'सोऽहं' बा 'अहँब्रम्हास्मि' रूप में निश्चय कराकर जीव (मनुष्य) को जीवन मुक्ति का बोध करादेते हैं। वही सद्गुरु उपास्य है । ऐसे श्रोत्रिय परमात्मनिष्ठ उपाधि वाले को सद्गुरु कहते हैं। सद्गुरु चैतन्य ब्रम्ह ज्ञान के अधिकारी हैं।
संसार में बहुत सारे क्षेत्र (Sector) है। यथा आध्यात्मिक, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, मशीन, बस्तु, अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कृषि, प्रबंधन, संगठन, कंपनी, कार्यक्षेत्र, कार्यकारिणी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, अंतरिक्ष, ब्यबसाय, चक्र, उपयोग, ईश्वरता, देवता, गबता, शबता, जीवता इत्यादि। उस सभी क्षेत्र में गुरु और सद्गुरु रहते हैं। उसमें से आध्यात्मिक क्षेत्र की सद्गुरु सबसे ऊपर रहते है। क्यूंकि आध्यात्मिक क्षेत्र की सद्गुरु ही सारे बात की कार्ज्य को कारण रूप में समझा सकते हैं और अपना ब्रम्ह स्वरुप में लय करा कर मुक्ति का रास्ता देखा देते है।
गुरु (Guru)-(Mentor)
जो भ्रांतियों एवं संशय से मुक्त करा कर अपना क्षेत्र (Sector) की व्यापार (Trade) का कार्य की कारण रूप का बिज्ञान दे कर चैतन्य स्वरूप परमात्मा रूप में लय करा दे कर उस परमात्मा को 'सोऽहं' बा 'अहँपरमात्मास्मि' रूप में निश्चय कराकर जीव (मनुष्य) को जीवन मुक्ति का बोध करादेते हैं। वही गुरु उपास्य है । ऐसे श्रोत्रिय आत्मनिष्ठ उपाधि वाले को गुरु कहते हैं। गुरु चैतन्य परमात्मा ज्ञान के अधिकारी हैं।
संसार में बहुत सारे क्षेत्र (Sector) है। यथा आध्यात्मिक, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, मशीन, बस्तु, अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कृषि, प्रबंधन, संगठन, कंपनी, कार्यक्षेत्र, कार्यकारिणी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, ब्यबसाय, चक्र, उपयोग, ईश्वरता, देवता, गबता, शबता, जीवता इत्यादि। उस सभी क्षेत्र (Sector) में बहु व्यापार (Trade) रहते हैं। Example- अभियांत्रिकी क्षेत्र (Engineering Sector) की अभियांत्रिकी व्यापारों (Engineering Trades)= Spiritual, software, hardware, networking, electronic, electrical, sound, mechanical, automobile, marine, aeronautical, space, civil, chemical, telecommunication, architecture etc. उस सभी व्यापार में गुरु रहते हैं। उसमें से आध्यात्मिक व्यापार की गुरु सबसे ऊपर रहते है। क्यूंकि आध्यात्मिक व्यापार की गुरु ही सारे बात की कार्ज्य को कारण रूप में समझा सकते हैं और अपना परमात्मा स्वरुप में लय करा कर मुक्ति का रास्ता देखा देते है।
शिष्य (Sishya)-(Discilpe)
शिष्य अर्थात ज्ञान प्राप्ति द्वारा संसार रूप अज्ञान का नाश होकर दृढ़ आत्मभाब में जो स्तिथ रहता है वह शिष्य है। उसको शिष्य कहते हैं।
संसार में बहुत सारे क्षेत्र (Sector) है। यथा आध्यात्मिक, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, मशीन, बस्तु, अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कृषि, प्रबंधन, संगठन, कंपनी, कार्यक्षेत्र, कार्यकारिणी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, ब्यबसाय, चक्र, उपयोग, ईश्वरता, देवता, गबता, शबता, जीवता इत्यादि। उस सभी क्षेत्र (Sector) में बहु व्यापार (Trade) रहते हैं। उस सभी क्षेत्र और व्यापार में शिष्य रहते हैं। उसमें से आध्यात्मिक क्षेत्र और व्यापार की शिष्य सबसे ऊपर रहते है। क्यूंकि आध्यात्मिक क्षेत्र और व्यापार की शिष्य ही सारे बात की कार्ज्य को कारण रूप में समझ सकते हैं और अपना आत्मभाब स्वरुप में लय हो कर रहे सकते हैं।
श्रोत्रिय
जो शास्त्र का ज्ञाता है, शास्त्रों के कर्म, उपासना तथा ज्ञान प्रतिपादित बिषय को यथार्थ समझता है एबं प्रमाणों द्वारा जिज्ञांसु को समाधान करा भी देता है। उसको श्रोत्रिय कहते है।
ब्रम्हनिष्ठ
जिसने गुरु कृपा से ब्रम्ह का सोऽहं रूप से साक्ष्यातकार कर लिया है। उसको ब्रम्हनिष्ठ कहते है। किन्तु यदि वह श्रोत्रिय नहीं है तो जिज्ञांसु की शंकाओं का शास्त्र प्रमाणों द्वारा संशय रहित ज्ञान नहीं करा सकेगा।
परमात्मनिष्ठ
जिसने गुरु कृपा से परमात्मा का सोऽहं रूप से साक्ष्यातकार कर लिया है। उसको परमात्मनिष्ठ कहते है।
आत्मनिष्ठ
जिसने गुरु कृपा से आत्मा का सोऽहं रूप से साक्ष्यातकार कर लिया है। उसको आत्मनिष्ठ कहते है।
