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28/01/2026
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आचार्य परम पुज्य स्वामी भारतानन्दजी महाराज
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This Veda Vedant website written in Sanskrit, Hindi and English language.

True accompany-company-assemble-association
सतसंग (Satsang)-(True accompany)
जहाँ पर अपना बुद्धि की धारणा को सत्यनिष्ठ किया जाता है बा सत् की संग किया/दिया जाता है, उसको सतसंग कहाजाता है। Example – All spiritual research, search, study, though, minding, calculation, account, management, habit, practical, practice, excution etc.

स्वयं सतसंग (Swayam Satsang)-(Self true accompany)
जहाँ पर अपना बुद्धि की धारणा को सत्यनिष्ठ किया जाता है बा सत् की संग किया जाता है, उसको स्वयं सतसंग कहाजाता है। Example – All spiritual research, search, study, though, minding, calculation, account, management, habit, practical, practice, excution etc.

समूह सतसंग (Samuh satsang)-(Group true accompany)
जहाँ पर अपना बुद्धि की धारणा को सत्यनिष्ठ किया जाता है बा सत् की संग किया/दिया जाता है, और दूसरों का बुद्धि की धारणा भी सत्यनिष्ठ होता है किम्बा पूरा सारा समूह सदस्यों का बुद्धि की धारणा को सत्यनिष्ठ किया जाता है, उसको समूह सतसंग कहाजाता है। Example – All spiritual research, search, study, though, minding, calculation, account, management, habit, practical, practice, excution etc.

आध्यात्मिक सतसंग (Aadhyaatmik Satsang)-(Spiritual accompany) & प्रक्रिया चरण (procedure steps)
जहाँ पर अपना बुद्धि की धारणा को आध्यात्मिक चर्चा में सत्यनिष्ठ किया जाता है, और दूसरों का बुद्धि की धारणा भी आध्यात्मिकता से सत्यनिष्ठ हो जाता है उसको आध्यात्मिक सतसंग कहाजाता है। सतसंग में पहले स्वतंत्र 3 बार ॐ (aum) उच्चारण किया जाता है, उसके बाद lord/preceptor/mentor की संस्कृत श्लोक/सब्द में प्रार्थना किया जाता है। उसके बाद में बिद्या पाठ किया जाता है और बिद्या की explanation, solution & course दिया जाता है, उसके साथ संका समाधान भी चलता है। उसके बाद में ॐ (aum) उच्चारण के साथ शांति पाठ किया जाता है। उसके बाद में रोग निराकरण एबं शरीर की सक्रियण के लिए नृत्य योग की कौसल के साथ भाब भंगी के तालमेल सहित कुछ वाद्ययंत्र के बाद्य के साथ नाम संकीर्तन/कीर्तन/भजन किया जाता है। उसके बाद प्रसाद सेबन की program भी किया जाता है। सेष में सतसंग महल और शिविर (camp) को परिष्कार करके lord/Preceptor/mentor को सेष प्रणाम करके अपना घरको प्रस्थान किया जाता है।


धर्म (Dharma)-(Virtue/Righteousness/Religion)
जो सत्ता सचराचर स्थाबर जंगम संसार को समान रूप से धारण करता है और प्रकाशित करता है उसे धर्म कहते हैं। जैसे आकाश, तेज, बायु, जल, पृथ्वी, उद्भिद, प्राणी, पशु, पक्षी, सरीसृप, जलज जीव, मनुष्य, उपग्रह, ग्रह, नक्ष्यत्र, ग्रहण, तारकामंडल, ब्रम्हांड, बिस्वरूप, रस्मि, शून्य, ईसान, नैरूत, कार्ज्यन, ईश्वर, देब, गब, शब, जीव, भूत, प्रेत, भविष्यत, काल, वेद, वेदान्त, भेध । धर्म अनादि अनंत हैं। वह परम्ब्रम्ह श्रीचैतन्य स्वरुप हैं।

बैराग्य (Bairagya)-(Disinterest)
इस जगत के सुखों से लेकर स्वर्ग लोकों के सुख की इच्छा न करने को बैराग्य कहा जाता है। जिस चीज के प्रति बैराग्य आ रहा है, उसी पदार्थ के सृष्टि, संरचना, निर्माण, विनिर्माण, ब्यबहार, उपयोग लक्ष्य, स्वचालित, हस्तसंचालन, नियमावली, चक्र, उपयोग, पुनर्चक्रण, पुन: उपयोग इत्यादि की बिज्ञान ले कर स्वयं स्वर्ग में जा कर वही पदार्थ बन जाना और बाद में एक अलग रूप में बना देना, आगे बैराग्य समय आने पर अपने आपको उसी पदार्थ स्वयं की शरीर रूप में मिलेगा और उसे अलग किम्बा दूर होना नहीं पड़ेगा।

बिबेक (Bibeka)-(Rationality)
दो मिली वस्तुओं में पृथक-पृथक् जान लेने को और अंतःकरण की नियंत्रणात्मक वृत्ति को बिबेक कहते हैं। जैसे शरीर किया है? परिबर्तनशील किया है? अपरिबर्तनशील किया है? अनित्य किया है? नित्य किया है? असत् किया है? सत् किया है? विनाशी किया है? अविनाशी किया है? प्रकृति किया है? बिकृति किया है? संस्कृति किया है? स्वयं प्रकाश किया है? पर प्रकाश किया है? जड़ किया है? चेतन किया है? दृश्य किया है? द्रष्टा किया है? साक्षी किया है? विद्या किया है? अबिद्या किया है? क्षेत्र का स्वभाब है? क्षेत्रंज्ञ का स्वभाब है? इत्यादि।

बुद्धि (Budhi)-(Intellect)
अंतःकरण की निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि कहते हैं।

मन (Mana)-(Mind)
अंतःकरण की संकल्प विकल्पात्मक वृत्ति को मन कहते है।

चित्त (Chitta)-(Think)
अंतःकरण की चिंतनात्मक वृत्ति को चित्त कहते हैं।

अहंकार (Ahankara)-(Arrogance)
अंतःकरण की अभिमानात्मक वृत्ति को अहंकार कहते हैं।

शरीर (Sharir)-(Body)
पांच महाभूत के पच्चीस तत्व से निर्मित जीव आत्मा का भोगायतन और नूतन कर्म करने का क्षेत्र को, शरीर कहते हैं। आमतौर पर हड्डी, मांस, रक्त कोशिका प्रत्येक 2.89 करोड़/28,900,000 कोशिकाएं होती हैं। उससे थोड़ा कम भी हो सकते हैं और जादा भी हो सकते हैं।
आत्मा शरीर, महात्मा शरीर, परमात्मा शरीर, ब्रम्ह शरीर, महाब्रम्ह शरीर, परमब्रम्ह शरीर, चैतन्य शरीर, श्रीचैतन्य शरीर, चेतना शरीर, जड़ शरीर, विश्वरूप शरीर, रस्मी शरीर, शून्य शरीर, यिशान शरीर, नैरुत शरीर, कार्ज्यन शरीर, ईश्वर शरीर, देव शरीर, गब शरीर, शब शरीर, जीव शरीर, बस्तु शरीर, दैत्य शरीर, दानब शरीर, गतिमान शरीर इत्यादि।
जीव शरीर, महाजीव शरीर, परमजीव शरीर, जीवब्रम्ह शरीर, जीवमहाब्रम्ह शरीर, जीवपरमब्रम्ह शरीर, जीवचैतन्य शरीर इत्यादि।
देव शरीर, महादेव शरीर, परमदेव शरीर, देवब्रम्ह शरीर, देवमहाब्रम्ह शरीर, देवपरमब्रम्ह शरीर, देवचैतन्य शरीर इत्यादि।
ईश्वर शरीर, महाईश्वर शरीर, परमईश्वर शरीर, ईश्वरब्रम्ह शरीर, ईश्वरमहाब्रम्ह शरीर, ईश्वरपरमब्रम्ह शरीर, ईश्वरचैतन्य शरीर इत्यादि। like that……….
विराट, हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, वैश्वानर, सूत्रात्मा, अन्तर्यामी, स्थूल, सुक्ष्म, कारण, बिश्व, तैजस, प्राज्ञ इत्यादि। like that……….

जीव (Jiva)-(Bio)
विद्या/बाया अन्तःकरण में झलकने वाला चैतन्य आत्मा का प्रतिबिम्ब रूप चिदाभास, और विद्या/बाया, तथा अन्तःकरण काअधिष्ठान कूटस्थ आत्मा यह तीनों को मिलाकर जीव कहा जाता है।

ईश्वर (Iswar)-(Indus)
ज्ञान/माया अन्तःकरण में झलकने वाला चैतन्य परमात्मा का प्रतिबिम्ब रूप चिदाभास, और ज्ञान/माया, तथा अन्तःकरण का अधिष्ठान कूटस्थ परमात्मा यह तीनों को मिलाकर ईश्वर कहा जाता है।


चिदाभास (Chidabhasa)
जो चैतन्य न होते हुए भी चैतन्य की तरह प्रतीत होते हैं उसे चिदाभास कहेत है। जैसे इसी जीव ब्रम्ह में, अंतःकरण में चैतन्य आत्मा के प्रतिबिम्ब को चिदाभास या जीव चिदाभास कहते हैं, और देब ब्रम्ह में देव चिदाभास एबं ईश्वर ब्रम्ह में ईश्वर चिदाभास कहते है । जल पात्र में सूर्य या मुख के प्रतिबिम्ब को सूर्याभास या मुखाभास कहते हैं।

चिदाभास के भेद (Distinction of Chidabhasa)

गब                          देब

 देब                         ईश्वर

 ईश्वर                       कार्ज्यन  

    जीव         

बाया                          माया
अलपज्ञ                     सर्बग्य
अल्पशक्तिमान      सर्बशक्तिमान
पराधीन                      स्वतंत्र
बायाधीश                   मायाधीस
बद्ध                             मुक्त
आनंद                       अनंदघन
अपरोक्ष                    परोक्ष
परिच्छिन                 अपरिच्छिन
ज्ञान                          बिज्ञान
अनेक                       एक
अल्पसमर्थ                बहुसमर्थ

बाया                          माया
अलपज्ञ                     सर्बग्य
अल्पशक्तिमान   र्बशक्तिमान
पराधीन                      स्वतंत्र
बायाधीश                   मायाधीस
बद्ध                             मुक्त
आनंद                       अनंदघन
अपरोक्ष                    परोक्ष
परिच्छिन                 परिच्छिन
ज्ञान                          बिज्ञान
अनेक                       एक
अल्पसमर्थ                बहुसमर्थ

बाया                          माया
अलपज्ञ                     सर्बग्य
अल्पशक्तिमान      सर्बशक्तिमान
पराधीन                      स्वतंत्र
बायाधीश                   मायाधीस
बद्ध                      मुक्त
आनंद                       अनंदघन
अपरोक्ष                    परोक्ष
परिच्छिन                 अपरिच्छिन
ज्ञान                          बिज्ञान
अनेक                       एक
अल्पसमर्थ                बहुसमर्थ

बाया/काया/माया
अलपज्ञ/बिज्ञ/सर्बग्य
अल्प/शक्तिमान/सर्बशक्तिमान
पराधीन/स्वचालित/स्वतंत्र
बायाधीश/ कायाधीस/मायाधीस
बद्ध/जाल/मुक्त
आनंद/शून्यानंद/अनंदघन
अपरोक्ष/प्रत्यक्ष/परोक्ष
परिच्छिन/च्छिन/अपरिच्छिन
ज्ञान/विद्या/बिज्ञान
अनेक/बहुएक/एक
अल्पसमर्थ/समर्थ/बहुसमर्थ


अन्तःकरण (Antahkarana)-(conscience)
अपंचीकृत पंचभूत के मिलित सात्विक अंश से यह निर्मित है और सुक्ष्म शरीर के अंत/excel भाग होते हैं, उसको अन्तःकरण कहते है। हमारा शरीर के अंत/excel भाग में जो कार्ज्य कारिणी समापन होते है वह सब अन्तःकरण के अंदर ही होते/चलते हैं, जेसे मनन, चिंतन, research इत्यादि। जो मुख्य रूप से 19 तत्तवों का माना जाता है। जो शरीर के अंदर रहकर इन्द्रिय ज्ञान में सहायक होता है। इसमें ज्ञानशक्ति प्रधान होती है। उसमे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, अनुताप, पश्चाताप, समाधान इत्यादि बृतियाँ चलते हैं।

प्रकृति (Prakruti)-(Nature)
जीव, शब, गब, देब, ईश्वर, कार्ज्यन, नैरूत, ईसान (पृथ्वी, जल, वायु, तेज, आकाश) शून्य, रस्मि, आनंद, कष्ट, पेड़, पौधे, लता, अग्नि, वर्षा, पवन, मनुष्य, पशु, पक्षी, सरीसृप, कृमि, कीट, कीड़ा, ज्ञान, विद्या, बिज्ञान, कण व्यवहार (element behavior) एबं समस्त inner of the engineering को मिला के प्रकृति कहा जाता है। 

ज्ञान के साधन (Gyan ke Sadhan)-(Practice of knowledge)
विवेक, वैराग्य, षट् सम्पत्ति (शम, दम, श्रद्धा, तितिक्षा, उपरामता, समाधानता, साधन), मुमुक्षुता, श्रबण, मनन, निदिध्यासन, महाबाक्य की शोधन, ध्यान यह बुद्धि ज्ञान के नौ अन्तरंग साधन है। जिससे बुद्धि गत असंभावना एवं विपरीत भावना की निवृत्ति होती है। तथा ध्यान, मंत्र, पूजा, पाठ, माला, जप, तप, तीर्थ, मंदिर, ब्रत, उपवास, दान, यज्ञादी इत्यादि कर्म काण्ड ज्ञानाधिकारी बनने के बहिरंग साधन है। जिससे चित्त शुद्धि होता है। मुमुखु को सद्गुरु मिलीजाने पर अन्तरंग साधन का ज्यादा सेबन करना चाहिए एबं बहिरंग साधन को कम कर देना चाहिए।


वेदों के मंत्र, त्रिकांड, त्रिदोष एबं फल


मंत्र     

80,000

16,000

4,000

काण्ड 

कर्म (Deed)

उपासना (Worship)

ज्ञान (Knowledge) 

दोष       

मल

विक्षेप

आवरण

फल     

मन निष्पाप     

आत्मा जिज्ञासा

मुक्ति


अविद्यां ददाति मूर्खतां, मूर्खताद् याति अपात्रताम्। अपात्रत्वात् दरिद्रमाप्नोति, दरिद्रतात् अधर्मं ततः दुःखम्॥
विद्यां ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥
विद्या देता है विनय, विनय से आता है पात्रता, पात्रता से धन बनाने की योग्यता आता है, धन से धर्म किया जाता है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है।

स्वगृहे पूज्यते मूर्खः, स्वग्रामे पूज्यते ग्रामिः। स्वराज्ये पूज्यते राजा, स्वदेशे पूज्यते दाशा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।
स्वगृहे पूज्यते मूर्खः, स्वग्रामे पूज्यते ग्रामिः। स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।
मूर्ख व्यक्ति का अपने घर में महत्व होता है। ग्रामि (गाँव की रखबाला) को गाँव में सब पूजते है। देश में राजा को पूजा जाता है। विद्वान को सभी जगहों पर पूजा जाता है। सब जगह उसकी महानता की बाते की जाती है।

समत्वं योग उच्यते
ॐ नारायण तत्व कर्मसु कौशलम्, उत्पत्ति समये योगः कर्मसु कौशलम्, बिपत्ति समये बियोगः कर्मसु कौशलम् ।
योगः कर्मसु कौशलम्
परधर्मो भयावहः
स्वधर्मे निधनं श्रेयः
गुणा गुणेषु वर्तन्त
सर्बधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।
पण्डिताः समदर्शिनः
बिमुक्तश्च विमुच्यते
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय ।
ॐ मातृ देवो भव। पितृ देवो भव। आचार्य देवो भव। अतिथि देवो भव॥
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
ॐ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
ॐ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशालाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
ॐ मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः । मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


चौदह त्रिपुटी

 

अध्यात्म

अधिदेव

अधिभूत

अन्तःकरण चतुष्टय

मन

चन्द्र

संकल्प-बिकल्प

बुद्धि

ब्रम्हा

निश्चय करना

चित्त

बिष्नु

चिंतन करना

अहंकार

शिव

अभिमान

पंच ज्ञानेन्द्रिय

श्रोत्र

दिशा

शब्द

चक्षु

सूर्ज्य

रूप

त्वाचा

पबन

स्पर्श

जिह्वा

बरुण

रस

घ्राण

अश्वनी

गंध

पंच कर्मेन्द्रिय

बाक

अग्नि

कहना, बचन

पाद

बामन

चलना

पानी

इन्द्र

ग्रहण-त्याग

लिंग

प्रजापति

मूत्र, मैथुन

गुदा

यम

मलत्याग

 

 

 

 


त्रिपुटी
अध्यात्म - अधिदेव - अधिभूत के योग को त्रिपुटी कहते है।

अध्यात्म
आत्म आश्रित चौदह इन्द्रियों को अध्यात्म कहा जाता है।

अधिदेव
देह संघात से भिन्न इन्द्रिय अगोचर, इन्द्रियों के प्रकाशक देबता को अधिदेव कहते हैं।

अधिभूत
देह संघात से भिन्न इन्द्रिय ग्राह्य, इन्द्रियों के भुत बिषय को सब्दा, रूप, स्पर्श, रस, गंधादी पंच बिषय को अधिभूत कहते हैं।

 

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